आज सुबह से ही फोन पर फोन आ रहे थे। बधाई देने के लिये। अरे-अरे हंसिये मत इसका वेलेंन्टाइन डे से कुछ लेना-देना नहीं। आज दिन है हमारी शादी की २३वीं सालगिरह का । शादी की याद आते ही उससे जुडी तमाम यादें,बातें ज़ेहन में घूम जाती है। कुछ खट्टी कुछ मीठी।
शादी के कुछ महीने पहले मम्मी यानि (सास)का पत्र आया।मजमून कुछ इस तरह था-अनु रानी हमारे यहां नई दुल्हन से गाना गवाया जाता है। ये एक रस्म है इसलिये गाना अभी से सीख लेना। पत्र पढते ही दिमाग भन्ना गया। हम तो गलती से घरवालों की उपस्थिति में बाथरुम में भी नहीं गुनगुनाते फिर यहां तो सबके सामने गाने की बात है। मम्मी समझा-समझा कर परेशान कि संगीत स्कूल चली जाऒ। जब भी मम्मी समझाने की कोशिश करती मैं कूद कर इस बात पर आ जाती कि -" लडकी हूं ना इसलिये ये सब दादागिरी। मैं जैसी हूं उसमें क्या? आप मनीष को क्यों नहीं कहती कि हमारे यहां भी रस्में होती हैं और उसे भी करनी पडेगी। वो मानेगा क्या?" ऒर भी ढेर सारे ऊल-जलूल तर्क-कुतर्क करती।
ये सिलसिला और लडाई कई दिनों चली। मेरी खास सहेली साधना इन सब बातों की चश्मदीद थी। उस दिन वो बिना बोले साइकिल लेकर चल दी। थोडी देर बाद एक मध्यवय के सज्जन के साथ हारमोनियम लिये हाजिर। ये है ,इसे सीखाना है। मैं इस अप्रत्याशित हरकत के लिये तैयार नहीं थी। खैर इधर-उधर की बातों के बाद उन्होनें गाने को कहा-ज़िद या संकोच कि गले से आवाज़ निकलने को तैयार नहीं। तीन-चार दिन की समझाइश के बाद एक फिल्मी गाना गुनगुनाया । लय-ताल , सुर सब बेताल ये दीगर बात की अभी तक उनसे दोस्ती नहीं हो पाई।
रहीम सर हमारी आवाज़ से खासे प्रभावित गिरते -पडते बस एक गाना वो सिखा पाये"आज खेलो श्याम संग होरी पिचकारी रंग भरी केसर की"इस गाने में गले को अच्छी खासी मशक्कत करानी पडती थी। भैया की शादी हमसे तीन-चार दिन पहले हुई थी। भाभी से जब गाने को कहा गया तो बिना एक सैंकंड गवाये दनादन ढोलक को थाप दे दे गाना सुनाया "मेरी नई -नई सासों के नखरे नये,बागों में जाये तो माली मटके" जब डांस की फरमाइश हुई तो एक की जगह तीन-चार गानों पर नाच कर दिखा दिया। नेग चार हुये ,सारे रिश्तेदार खुश सुघड बहू आई है।
अब मम्मी की वक्र दृष्टि हम पर थी। कि हम ना जाने क्या गुल खिलायेंगें अपनी ससुराल में।आखिरी पांच दिन में अब नये सिरे से गाना चुना गया-"जिभिया चटापट हुइबे ऒ हम खइबे जलेबिया ,सासु को दइबे बियाज में हम खइबे जलेबिया। ऐसे एक-एक करके सारे रिशतेदारों को ब्याज में दे देना था। जब भी गाने की कोशिश करते बराबर के भाई-बहिन टांग खिंचाई शुरु कर देते। देखो कितनी चटोरी है। दूसरा बोलता अरे किसी को मत छोडना उठा-उठा कर ब्याज में देते रहना एक-एक को। हम शादी को इन्जाय करने की बजाय पूरे समय आशंकित थे कि तब क्या होगा।
शादी के बाद की वो घडी भी आ गई -गोल घेरा बना कर सारे रिश्तेदार इर्द-गिर्द उत्सुकता के साथ कुछ अच्छा सा सुनने की उम्मीद लगाये एक-टक देख रहे थे। ऐन मौके पर हिम्मत जवाब दे गई। आवाज़ साथ देने को तैयार नहीं। हमारे मौन को मम्मी अपनी अवमानना मान कर नाराज़ सी लग रही थी। मनीष शुरु में मज़ा ले रहे थे,पर बाद में उनकी आंखों में हमारे लिये दया स्पष्ट दिख रही थी। पापा ने बात सम्भाली चलो छोडो अब तो ये यहीं है फिर कभी सुन लेना। लेकिन बुआ जी वगैरह छोडने के मूड में कतई नहीं थी। इस ना-नुकर के बीच कई धैर्यहीन श्रोतागण खिसक लिये। ये देख हमने राहत की सांस ली कि चलो कम लोगो के सामने मखौल उडेगा और फिर गाना सुना ही दिया। सब बडे खुश थे कि शगुन पूरा हुआ। मम्मी भी अब प्रसन्न थी बाद में बोली "तुम बेकार डर रही थी"।अब लगता है कि ये रस्में बडे सोच-समझ कर बनायीं गईं हैं कि नई दुल्हन नये परिवेश में सबसे घुल-मिल जाये और उसकी झिझक भी कम हो जाये।
Thursday, February 14, 2008
Wednesday, February 13, 2008
नन्हीं बडी हो गयी
कृति का फोन था खुशी से लरजती आवाज़ "मां इन्फोसिस में मेरा सलेक्शन हो गया"सुन कर राहत की सांस ली। भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उसका आत्मविश्वास डिगा नहीं। पहली बार में असफलता हाथ आने पर निराशा की भावना बलवती हो जाती। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
पिछले दो दिनों से उसे लेकर बेहद परेशान थी। परीक्षा के तीन दिन बाद ही कैम्पस सलेक्शन के लिये इन्फोसिस आ रही है। मानसिक रुप से कोई भी इतनी जल्दी इन्फोसिस के लिये तैयार नहीं था। पर उसके लिये
कुछ नहीं किया जा सकता था। कृति बी टेक थर्ड इयर की छात्रा है। उसका 11 को एप्टीट्यूड का टेस्ट हुआ। शाम तक रिजल्ट आना था। फिर कटलिस्ट बन कर इन्टरव्यू होना था। एप्टीट्यूड टेस्ट देते ही फोन आया। मां पेपर अच्छा नहीं हुआ । मेरा क्या होगा? मैंने उतने ही शान्त स्वर में कहा कोई बात नहीं दूसरी कम्पनी भी तो आयेंगी उसमें ज्यादा मेहनत करके देना। बस सुनते ही बिफर गयी "जानती हो ,ऐसे मौके मुशकिल से मिलते हैं"। जितना गुबार ,दुख,आक्रोश वो निकाल सकती थी वो निकाला हमेशा की तरह मां थी ना सुनने के लिये। उसकी पुरानी आदत है-परेशान होगी तो तुरन्त फोन करके बतायेगी। समझाऔ तो लडेगी पर फिर थोडी देर में फोन करके सॉरी बोलेगी तरह -तरह से मनायेगी कि आपको नहीं कहूंगी या आपसे नहीं लडूंगी तो किसको कहूंगी बोलो मां। मैं इन्तज़ार करती रही पर फोन नहीं आया। शाम को फोन आया सॉरी मां परेशान थी टेस्ट क्लियर हो गया मां अब थोडी देर बाद इन्टरव्यू है । हो तो जायेगा ना मां। हां बोलो मां। "हां हो जायेगा - पर तुम अनावश्यक दिमाग पर बोझ मत लो अपनी तरफ से पूरा प्रयास करो। क्या होगा वो मत सोचो अभी। ऐसा कहीं होता है क्या मां? अच्छा पहले फ्री हो जाऒ फिर बात करते हैं। रात नौ बजे उसने बताया कि इन्टरव्यू हो गया पर कुछ कहा नहीं जा सकता। उसकी आवाज़ साफ बता रही थी कि वो बेहद परेशान है। अब मेरी बारी थी समझाने की। "देखो जो होगा अच्छे के लिये होगा चिन्ता मत करो। नहीं होगा तो सोचो कोई ज्यादा अच्छा मौका मिलने वाला है"। जाऒ घर जाकर अब रेस्ट करो पूरा दिन हो गया। ठीक है और बात खत्म । सुबह में पूरी तरह से जागी भी नहीं थी की कृति का फोन- मां हो जायेगा ना? हां बोलो मां। मैं उसकी आवाज़ की व्याकुलता से भीग सी गई- हां हो जायेगा बेटू टेन्शन क्यों करती हो। अच्छा, आज इतनी सुबह कैसे जागी? नींद नहीं आयी मां। कालेज भी जाना है आज दूसरे कालेज भी जाना है वहां भी कम्पनी आयी है। जाऊं या नहीं? ये तो तुम्हें सोचना है। ठीक है मां। दिन भर थोडी-थोडी देर बाद फोन आते रहे। "हां बोलो मां' बस एक ये ही बात।
कुछ नहीं किया जा सकता था। कृति बी टेक थर्ड इयर की छात्रा है। उसका 11 को एप्टीट्यूड का टेस्ट हुआ। शाम तक रिजल्ट आना था। फिर कटलिस्ट बन कर इन्टरव्यू होना था। एप्टीट्यूड टेस्ट देते ही फोन आया। मां पेपर अच्छा नहीं हुआ । मेरा क्या होगा? मैंने उतने ही शान्त स्वर में कहा कोई बात नहीं दूसरी कम्पनी भी तो आयेंगी उसमें ज्यादा मेहनत करके देना। बस सुनते ही बिफर गयी "जानती हो ,ऐसे मौके मुशकिल से मिलते हैं"। जितना गुबार ,दुख,आक्रोश वो निकाल सकती थी वो निकाला हमेशा की तरह मां थी ना सुनने के लिये। उसकी पुरानी आदत है-परेशान होगी तो तुरन्त फोन करके बतायेगी। समझाऔ तो लडेगी पर फिर थोडी देर में फोन करके सॉरी बोलेगी तरह -तरह से मनायेगी कि आपको नहीं कहूंगी या आपसे नहीं लडूंगी तो किसको कहूंगी बोलो मां। मैं इन्तज़ार करती रही पर फोन नहीं आया। शाम को फोन आया सॉरी मां परेशान थी टेस्ट क्लियर हो गया मां अब थोडी देर बाद इन्टरव्यू है । हो तो जायेगा ना मां। हां बोलो मां। "हां हो जायेगा - पर तुम अनावश्यक दिमाग पर बोझ मत लो अपनी तरफ से पूरा प्रयास करो। क्या होगा वो मत सोचो अभी। ऐसा कहीं होता है क्या मां? अच्छा पहले फ्री हो जाऒ फिर बात करते हैं। रात नौ बजे उसने बताया कि इन्टरव्यू हो गया पर कुछ कहा नहीं जा सकता। उसकी आवाज़ साफ बता रही थी कि वो बेहद परेशान है। अब मेरी बारी थी समझाने की। "देखो जो होगा अच्छे के लिये होगा चिन्ता मत करो। नहीं होगा तो सोचो कोई ज्यादा अच्छा मौका मिलने वाला है"। जाऒ घर जाकर अब रेस्ट करो पूरा दिन हो गया। ठीक है और बात खत्म । सुबह में पूरी तरह से जागी भी नहीं थी की कृति का फोन- मां हो जायेगा ना? हां बोलो मां। मैं उसकी आवाज़ की व्याकुलता से भीग सी गई- हां हो जायेगा बेटू टेन्शन क्यों करती हो। अच्छा, आज इतनी सुबह कैसे जागी? नींद नहीं आयी मां। कालेज भी जाना है आज दूसरे कालेज भी जाना है वहां भी कम्पनी आयी है। जाऊं या नहीं? ये तो तुम्हें सोचना है। ठीक है मां। दिन भर थोडी-थोडी देर बाद फोन आते रहे। "हां बोलो मां' बस एक ये ही बात।कृति शुरु से ऐसी ही है। छोटी थी तो चिपकु बच्चा थी। सामने दिखती रहती तो खेलती ना पा कर पूरा घर सिर पर उठा लेती। कभी-कभी शाम को गोदी में बैठ कर मेरे दोनों हाथ पकड कर बैठ जाती आज मेरी मम्मी काम नहीं करेगी। मैं शर्म से पानी-पानी कि घर वाले क्या सोचेंगें। अम्मा से फर्माइश होती- हलवा बनाऔ, फिर पूरी कढाई पर कब्जा जमा कर बैठ जाती कि बस मैं और मम्मी खायेंगें। नहाने जाती तो बाथरुम के बाहर डेरा डाल कर बैठ जाती। हां इति के होने के बाद थोडा परिवर्तन जरुर आया। धीरे-धीरे जिम्मेदारी का भाव भी आता गया घर से बाहर निकलने पर आत्मविश्वास भी बडा।
दिल के गवाक्ष खुले हैं और यादों की मंजूषा भी। फिर से फोन की घंटी बज रही है। अब तफ्सील से हर बात बतायी जायेगी । आज अहसास हुआ कि बच्चे बडे हो गये हैं । वक्त ना जाने कैसे इतनी तेजी से गुजर गया पता ही नहीं चला।
Monday, January 28, 2008
उड़ता मखौल और चूं न करते लोग
कल कहीं टी वी पर हिन्दी का मखौल उडाया जा रहा था तो कहीं उसके साहित्य सृजन से जुडे लोगों का । कान ऐसे पकडिये या वैसे बात तो एक ही है ना। कब तक हिंदी के साथ अपनी ही धरती पर दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहेगा और कब तक इसे सहना होगा। मौका था "जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल" का। चर्चा थी "राजस्थानी लोक साहित्य" पर ।
कार्यक्रम अलग-अलग दौर ,विषय और समय सीमा में विभाजित था।राजस्थानी लोक साहित्य पर चर्चा करने के लिये दो मशहूर राजस्थानी लेखक श्रीलाल मोहता और चंद्रप्रकाश जी देवल अपने निर्धारित समय पर उपस्थित थे। पर पहले से चल रही अंग्रेजी प्रकाशकों की वार्ता और चर्चा का दौर चल रहा था जिसके फलस्वरुप राजस्थानी लोक साहित्य पर चर्चा का दौर निर्धारित समय पर शुरु ना होकर कुछ विलम्ब से शुरु हुआ।
चर्चा परवान चढ़ रही थी कि तभी आयोजन से जुडी अंग्रेजी की चर्चित उपन्यासकार नमिता गोखले ने समय सीमा का हवाला दे कर दोनों को अपमानित किया और उन पर जमकर बरसीं ।साथ ही उन्हें बिना चर्चा को समाप्त किये मंच से उतर आने पर विवश किया। यदि वो समय की इतनी ही पाबन्द थी तो पूर्व में चल रही वार्ता में उन्होंने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया था। फिर उस पर नमिता के इस कथन ने किसी और को ना सही पर मुझे आहत किया कि "ये हिन्दी -राजस्थानी वाले तो माइक से चिपक जाते हैं। इन्हें चुप कराना बडा मुश्किल है। अंग्रेजी वाले इस मामले में आर्गेनाइज्ड रहते हैं। वे समय पर बात खत्म कर देते हैं।बीच में टोके जाने पर बुरा नहीं मानते"। उसके बाद का बडबोलापन यह,उन्होने दावा किया कि वो कई बार हिंदी लेखकों को स्टेज से उतार चुकीं हैं।
समाजसेवी स्वामी हग्निवेश और चित्रा मुदगल भी वहां उपस्थित थी, साथ ही इस बात पर चित्रा जी ने कहा भी" अंग्रेजी के लिये तो बडा सभागार रखा गया पर हिन्दी और राजस्थानी के लिये उपेक्षित सा ये कोना दिया गया"।
भाषा का और उससे जुडे लोगो का इससे ज्यादा क्या अपमान होगा? धिक्कार है उन पर जो ऐसे आयोजनों में मौजूद तो रहते हैं पर विरोध तक नही कर सकते। धिक्कार है हम पर भी जो मूक दर्शक बने सहते रहते हैं। जब तक ऐसे बर्तावों की खिलाफत नहीं की जायेगी तब तक बारम्बार इसी तरह होता रहेगा। अपने ही लोगों के हाथों अपनी अस्मिता पर आंच आते देखते रहेंगें और यूं ही मखौल उडवाते रहेंगें।
पूरी जानकारी के लिए दैनिक भास्कर की इस खबर को पढ़ा जा सकता है।
कार्यक्रम अलग-अलग दौर ,विषय और समय सीमा में विभाजित था।राजस्थानी लोक साहित्य पर चर्चा करने के लिये दो मशहूर राजस्थानी लेखक श्रीलाल मोहता और चंद्रप्रकाश जी देवल अपने निर्धारित समय पर उपस्थित थे। पर पहले से चल रही अंग्रेजी प्रकाशकों की वार्ता और चर्चा का दौर चल रहा था जिसके फलस्वरुप राजस्थानी लोक साहित्य पर चर्चा का दौर निर्धारित समय पर शुरु ना होकर कुछ विलम्ब से शुरु हुआ।
चर्चा परवान चढ़ रही थी कि तभी आयोजन से जुडी अंग्रेजी की चर्चित उपन्यासकार नमिता गोखले ने समय सीमा का हवाला दे कर दोनों को अपमानित किया और उन पर जमकर बरसीं ।साथ ही उन्हें बिना चर्चा को समाप्त किये मंच से उतर आने पर विवश किया। यदि वो समय की इतनी ही पाबन्द थी तो पूर्व में चल रही वार्ता में उन्होंने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया था। फिर उस पर नमिता के इस कथन ने किसी और को ना सही पर मुझे आहत किया कि "ये हिन्दी -राजस्थानी वाले तो माइक से चिपक जाते हैं। इन्हें चुप कराना बडा मुश्किल है। अंग्रेजी वाले इस मामले में आर्गेनाइज्ड रहते हैं। वे समय पर बात खत्म कर देते हैं।बीच में टोके जाने पर बुरा नहीं मानते"। उसके बाद का बडबोलापन यह,उन्होने दावा किया कि वो कई बार हिंदी लेखकों को स्टेज से उतार चुकीं हैं।
समाजसेवी स्वामी हग्निवेश और चित्रा मुदगल भी वहां उपस्थित थी, साथ ही इस बात पर चित्रा जी ने कहा भी" अंग्रेजी के लिये तो बडा सभागार रखा गया पर हिन्दी और राजस्थानी के लिये उपेक्षित सा ये कोना दिया गया"।
भाषा का और उससे जुडे लोगो का इससे ज्यादा क्या अपमान होगा? धिक्कार है उन पर जो ऐसे आयोजनों में मौजूद तो रहते हैं पर विरोध तक नही कर सकते। धिक्कार है हम पर भी जो मूक दर्शक बने सहते रहते हैं। जब तक ऐसे बर्तावों की खिलाफत नहीं की जायेगी तब तक बारम्बार इसी तरह होता रहेगा। अपने ही लोगों के हाथों अपनी अस्मिता पर आंच आते देखते रहेंगें और यूं ही मखौल उडवाते रहेंगें।
पूरी जानकारी के लिए दैनिक भास्कर की इस खबर को पढ़ा जा सकता है।
Saturday, January 26, 2008
गणतंत्र दिवस- दिल से या रस्म अदायगी.......
झंडारोहण के बाद कुछ देर पहले ही फैक्ट्री से लौटे हैं।दिल कुछ भारी सा है। आज गौर किया तो महसूस हुआ कि झंडारोहण के बाद राष्ट्रीयगान वाले सिर्फ कुछ ही लोग थे। मज़दूर महिलाऒं की बात छोड दी जाये क्योंकि अधिकांश अंगूठा छाप हैं। लेकिन बाकि लोगों की बात करें तो ? हम में से कितने है जो ऐसे समारोह में शिरकत करते हैं ।या साल में कितनी बार राष्ट्रगान गाते हैं। मैंने खुद याद करने की कोशिश करी तो याद आया पिछली बार पन्द्रह अगस्त को गाया था। गाया या बुदबुदाया ................ अगली बार शायद फिर स्वतंत्रता दिवस को ही गुनगुनाऊंगी।
उत्साह जैसे लाख चाह कर भी नहीं महसूस हो रहा है। वो रोमांच कहां गया जब बचपन में दस-पन्द्रह दिन पहले से गणतंत्र दिवस की बाट जोहते थे।अपने स्खूल में सिखाई गई ड्रिल को मोहल्ले को बच्चों को इक्ठ्ठा करके सिखाते थे।जब कोई नहीं मिलता तो दोनों भाई-बहिन एक-दूसरे की सशर्त ड्रिल देखते थे।परेडग्राउंड में पापा को यूनीफार्म में देख हम दोनों गर्व से इतराते थे। सहपाठियों की काना-फूसी और प्रश्न बार-बार आते-"तेरे पापा पुलिस में हैं क्या'?बाल सुलभ बुद्धि से तत्परता से जवाब देती -"नहीं, उससे भी बडे हैं। पता है- एन सी सी ऑफीसर हैं"।
वो भी याद है रिदम बिगडते ही लेझीम की हाथ पर चोट तडपा गई थी। पर सर ने कहा था- सबसे अच्छी ड्रिल हमारी होनी चाहिये ।इसलिये आंखों में आंसू भरकर भी बिना रुके करते गई थी।वो दिन भी याद है जब गणतंत्र दिवस को भय्या और मैं पिटे थे।साल में दो बार-पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को मम्मी स्कूल सफेद सिल्क की साडी जिसका एक अंगूल का लाल पाट था पहन कर जाती थी।उस दिन भी उन्होंने वो साडी निकाली पर बार्डर गायब। मां को समझ नहीं आ रहा था कि ये वो ही साडी है या कोई ऒर । अगर वही है तो बार्डर कहा गया? तभी भैया से चिढी हुई मैंने पोल खोल दी कि इसने लाल पाट को फाडकर पतंग की पूंछ बना ली थी। दूर से भैया चिल्लाया "झूठ्ठी तेरी पतंग की भी तूने पूंछ बनायी थी"। हां, पर फाडी तो तेने थी ना। इतरा तो तू रही थी देख कैसी-मेचिंग-मेचिंग पूंछ है। मां का गुस्सा सातवें आसमान पर था और अगले ही पल हमारे लाल-लाल गाल।
खैर गणतंत्र दिवस बीत रहा है।आज जो गाने सूने है अब अगली बार पन्द्रह अगस्त को सुनने को मिलेंगें। मैं अभी भी असमंजस से घिरी उस उत्साह और रोमांच की तलाश में हूं जो राष्ट्रीय पर्व को लेकर होना चाहिये।
उत्साह जैसे लाख चाह कर भी नहीं महसूस हो रहा है। वो रोमांच कहां गया जब बचपन में दस-पन्द्रह दिन पहले से गणतंत्र दिवस की बाट जोहते थे।अपने स्खूल में सिखाई गई ड्रिल को मोहल्ले को बच्चों को इक्ठ्ठा करके सिखाते थे।जब कोई नहीं मिलता तो दोनों भाई-बहिन एक-दूसरे की सशर्त ड्रिल देखते थे।परेडग्राउंड में पापा को यूनीफार्म में देख हम दोनों गर्व से इतराते थे। सहपाठियों की काना-फूसी और प्रश्न बार-बार आते-"तेरे पापा पुलिस में हैं क्या'?बाल सुलभ बुद्धि से तत्परता से जवाब देती -"नहीं, उससे भी बडे हैं। पता है- एन सी सी ऑफीसर हैं"।
वो भी याद है रिदम बिगडते ही लेझीम की हाथ पर चोट तडपा गई थी। पर सर ने कहा था- सबसे अच्छी ड्रिल हमारी होनी चाहिये ।इसलिये आंखों में आंसू भरकर भी बिना रुके करते गई थी।वो दिन भी याद है जब गणतंत्र दिवस को भय्या और मैं पिटे थे।साल में दो बार-पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को मम्मी स्कूल सफेद सिल्क की साडी जिसका एक अंगूल का लाल पाट था पहन कर जाती थी।उस दिन भी उन्होंने वो साडी निकाली पर बार्डर गायब। मां को समझ नहीं आ रहा था कि ये वो ही साडी है या कोई ऒर । अगर वही है तो बार्डर कहा गया? तभी भैया से चिढी हुई मैंने पोल खोल दी कि इसने लाल पाट को फाडकर पतंग की पूंछ बना ली थी। दूर से भैया चिल्लाया "झूठ्ठी तेरी पतंग की भी तूने पूंछ बनायी थी"। हां, पर फाडी तो तेने थी ना। इतरा तो तू रही थी देख कैसी-मेचिंग-मेचिंग पूंछ है। मां का गुस्सा सातवें आसमान पर था और अगले ही पल हमारे लाल-लाल गाल।
खैर गणतंत्र दिवस बीत रहा है।आज जो गाने सूने है अब अगली बार पन्द्रह अगस्त को सुनने को मिलेंगें। मैं अभी भी असमंजस से घिरी उस उत्साह और रोमांच की तलाश में हूं जो राष्ट्रीय पर्व को लेकर होना चाहिये।
Thursday, January 24, 2008
पालतु रखिये- तनाव मुक्त रहिये
पालतु रखिये- तनाव मुक्त रहिये
अवसाद मुक्त रहना हे तो कोई भी पशु पालिये। जी हाँ अचूक इलाज़ है अकेलेपन का भी और अवसाद का भी। मैंने अपने बचपन से इनका संग पाया है। बच्चों के हास्टल जाने के बाद तो इनका संग अपरिहार्य हो गया है। बडी बेटी जब आज से ४ साल पहले हास्टल गयी तो पास में इति थी छोटी बेटी। सूनापन मन के आंगन में पसरा पर उससे उबर गयी।
जब इति के हास्टल जाने की बारी आई तो अपने अकेलेपन के बारें में सोच-सोच कर कलेजा मुहं को आने लगता था। सबके सामने बहादुर बनी मैं अकेले में ना जाने कितनी बार अपने आंसू पौंछती थी। वो दिन भी आ गया जब खुद उसे छोडने गयी। चलते वक्त बरबस आंखें भर आयी। रास्ता पूरा मौन पर रोते हुये गुज़रा। मैं रो-धोकर जी हल्का कर लेती थी पर मनीष एक-चुप हज़ार चुप थे। घर जहां ५-६ लोग हमेशा होते थे अब हम दो। वाकई घर का सूनापन दिल के खालीपन को और बडा देता था।
मम्मी-पापा इति के जाने के पहले ही हैदराबाद जा चुके थे ।अपने छोटे बेटे के पास कुछ दिन रहने के लिये। मनीष
उसकी इन छोटी-छोटी हरकतों ने ,प्यार ने हमें अपने अकेलेपन और उदासी से निकलने में बडी मदद करी। सही मानिये इनका साथ आप में नई स्फूर्ति पैदा करगा। कई रिसर्च ने भी इस बात पर सहमती जताई है कि पालतु जानवर का साथ आपके तनाव को कम करता है और आत्मविश्वास को बढाता है। फिर देरी किस बात की आप भी आज़मा कर देखिये।
Monday, January 14, 2008
होना इन्सपायर्ड युवाओं का
नये साल पर सब लोग नये-नये रिज़ाल्यूशन्स लेते है। पर हमारे संजीत भाई ने शुभ दिन चुना अपने जन्मदिन का । हमने भी मुबारकबाद दी बातों-बातों में पुछा तो पता चला कि इस बार का उनका रिज़ाल्यूशन्स’ है कि अपनी "हाथ अगरबत्ती पैर मोमबत्ती "वाली छवि से मुक्ति पायी जाये।
हमने पूछा -भई सोचा तो ठीक ही है तो इरादा क्या है? । थोडी देर मौन रहने के बाद कुछ झिझकते हुये -भाईजान ने फरमाया कि सोचा है योगा शुरू किया जाये। गुड, आइडिया तो अच्छा है। ज़नाब हौले से मुस्कुराये। कहीं कोई कैम्प ज्वाइन करना है क्या ? हमने प्रश्न दागा । बोले नहीं एक दोस्त बाहर से आने वाला है उससे सीडी मंगवाई है।
योगा ...................... सीडी........... बाहर से ............... हमारे कान कुछ खडे हुये।बिना मौका दिये तत्काल पूछा वो
शिल्पाशेट्टी वाली। अरे ,आपको कैसे पता? भैया उम्र का तकाज़ा है। इतना अनुभव तो हो चुका कि उडती चिडिया के पर गिन सके। हमने भी तीन दिन तक इंडिया टीवी पर दिखाई जाने वाली सुगठित देह-यष्टि ,सधी हुई मुद्रा ,श्वसन-प्रश्वसन ,प्राणायाम करती शिल्पाशेट्टी की योगा गुरु वाली सीडी की क्लीपिंग्स बिना पलक झपकाये बडे मंत्र-मुग्ध भाव से देखी थी। जब हमारा ये हाल था तो फिर संजीत का क्या हुआ होगा सहज अन्दाज़ा लगा सकते हैं। फिर संजीत ने जो रिज़ाल्यूशन्स लिया कोई ऐसे ही तो लिया नहीं होगा।
क्यों भई ,हम गलत थोडे ही कह रहें हैं। संजीत जैसे ना जाने कितने युवा इस सीडी से इन्सपायर्ड होंगें, आप अन्दाज़ा लगा ही सकते हैं।एक समय था जब बाबारामदेव योग क्रांति लाये थे । अब युवा दिल ,हर दिल अज़ीज़ शिल्पाशेट्टी नये रूप में हैं। साधुवाद , चलिये कोई तो कारण मिला हमारे युवा लोगों को इन्सपायर्ड होने का।
हमने पूछा -भई सोचा तो ठीक ही है तो इरादा क्या है? । थोडी देर मौन रहने के बाद कुछ झिझकते हुये -भाईजान ने फरमाया कि सोचा है योगा शुरू किया जाये। गुड, आइडिया तो अच्छा है। ज़नाब हौले से मुस्कुराये। कहीं कोई कैम्प ज्वाइन करना है क्या ? हमने प्रश्न दागा । बोले नहीं एक दोस्त बाहर से आने वाला है उससे सीडी मंगवाई है।
योगा ...................... सीडी........... बाहर से ............... हमारे कान कुछ खडे हुये।बिना मौका दिये तत्काल पूछा वो
शिल्पाशेट्टी वाली। अरे ,आपको कैसे पता? भैया उम्र का तकाज़ा है। इतना अनुभव तो हो चुका कि उडती चिडिया के पर गिन सके। हमने भी तीन दिन तक इंडिया टीवी पर दिखाई जाने वाली सुगठित देह-यष्टि ,सधी हुई मुद्रा ,श्वसन-प्रश्वसन ,प्राणायाम करती शिल्पाशेट्टी की योगा गुरु वाली सीडी की क्लीपिंग्स बिना पलक झपकाये बडे मंत्र-मुग्ध भाव से देखी थी। जब हमारा ये हाल था तो फिर संजीत का क्या हुआ होगा सहज अन्दाज़ा लगा सकते हैं। फिर संजीत ने जो रिज़ाल्यूशन्स लिया कोई ऐसे ही तो लिया नहीं होगा।क्यों भई ,हम गलत थोडे ही कह रहें हैं। संजीत जैसे ना जाने कितने युवा इस सीडी से इन्सपायर्ड होंगें, आप अन्दाज़ा लगा ही सकते हैं।एक समय था जब बाबारामदेव योग क्रांति लाये थे । अब युवा दिल ,हर दिल अज़ीज़ शिल्पाशेट्टी नये रूप में हैं। साधुवाद , चलिये कोई तो कारण मिला हमारे युवा लोगों को इन्सपायर्ड होने का।
Tuesday, January 8, 2008
मिलेगा ऐसा कोई कभी?
डॉ गरिमा तिवारी जिनसे परिचय तो हुआ था हिन्दयुग्म की प्रतियोगिता जीतने के बाद मेडिटेशन सीखने के दौरान ।लेकिन कब धीरे-धीरे उसने अपने लिये दिल में जगह बना ली कि पता ही नहीं चला । वो "मै और कुछ नही…" और "जीवन ऊर्जा" नाम से ब्लॉग लिखती है। उसकी इच्छा थी कि यह पोस्ट हम अपने ब्लॉग पर दें तो उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए हम उसकी पोस्ट यहां डाल रहे हैं------
अब ये सारी बाते उबकाई लाने के लिये बहुत लग रही थी... मै वहाँ से खिसकने के बहाने बना रही थी... लेकिन सहेली जी हैं कि बस... अंत तक उसे मेरी हालत पर तरस आ गया और मुझे निकलने की इजाजत दे दी एक शर्त के साथ की मै उसके दुसरे सहेली को साथ लेकर दुबारा 4 बजे आऊँगी... मुझे क्या चाहिये था.. खिसकने का बहाना... लेकिन ये क्या दुबारा आना... खैर मैने हाँ बोला और साँस लेने निकल पड़ी।
मै सोच रही थी कि कोई बहाना कर लूँ, पर वक्त पर उसकी सहेली आ गयी, और मरती क्या ना करती कबुतरखाने मे मुझे जाना ही पड़ा... वहाँ पहूँचे तो सब तैयार था... मेरी सहेली ने देखती ही इशारा किया (लेट क्यूँ किया?) वैसे जवाब वो जानती थी, मुझे कुछ कहना नही पड़ा... वैसे भी शायद मै बोल नही पाती..उन लोगो की बाते हो रही थी... बाते क्या सिर्फ सवाल... और सहेली कुछ सीमित शब्दो मे जवाब दिये जा रही थी। मै सोच रही थी मेरी शेरनी को क्या हुआ??? मेरी जिन्दगी मे यह पहला अनुभव इस तरह का.... वैसे टी वी सीरीयल मे कभी कभार देखा है या किसी से सुना है पर आँखो देखा अजीब लग रहा था...।
भईया मेरी स्थिती को भाँप गये (सहेली के बड़े भाई), और मेरे लिये स्थिती सामान्य करने के लहजे से बोल पड़े, डॉ साहिबा जरा औरा रीडींग कर दिजिये... थोड़ा आपका मुड भी हल्का हो जायेगा, और हमे कुछ जानकारी भी मिल जायेगी.... हुह! तब से चुप बैठी थी... थैंक्स भईया बोल के एक एक की रीडींग शुरू.... लगभग सभी लोग संतुष्ट थे... तभी किसी ने पुछा.. क्यूँ बेटा तुम्हे शादी नही करनी? मैने सोचा अपना वही प्यारा सा जवाब दे दूँ "नही" ... पर मै बोली... करनी तो है.. परआँटी जी बोले कि मेरी नजर मे एक लड़का है कहो तो तुम्हारे मम्मी से बात करूँ?मैने कहा शौक से... पर मेरी कुछ शर्ते हैं, लड़का इन शर्तो पर खरा उतरता हो तो... और मेरे शर्तो कि श्रृँखला शुरू हुई---
1.लड़का बहुत लम्बा ना हो, ना ज्यादा छोटा हो... मतलब मेरे जैसा
2. मेरा हम उम्र हो
3. गुस्से वाला ना हो
4. उसे खाना बनाने आता हो
5. मेरा ऑफिस जान उसे नागवार ना हो
6. घर सम्भालने की जिम्मेदारी उसकी
7. मै कभी देर से घर वापस आऊँ तो कोई सवाल ना पुछे
8. मेरी प्राइवेसी मे ताका-झाँकी ना करे
9. मुझसे, कभी, क्यूँ इत्यादि सवाल ना करे
10. मै थकी रहूँ तो पैर भी दबाये
11. मतलब कि एक आदर्श गृहणी आजतक जो जो करती आयी है, लगभग सारे काम वो करेगा....
12. रोज रोज मेरे लिये बाजार से चॉकलेट लाये... हाँ मै चॉकलेट मे मामले मे इमानदार हूँ, वो मिल बाँट के खा लेंगे।
13. और इन सारे शर्तो मे मै अपने हिसाब से कभी भे घट बढ़ा सकती हूँ।
14. वो कभी कोई शर्त मेरे सामने ना रखे.............
अब ये सारे शर्त कोई लड़का पूरा कर सके तो जरूर बताना.... वरना जरूरत नही है। इतना कहना था कि सब ठहाके लगाकर हँस पड़े और एकमत स्वर मे बोले, ऐसा लड़का मिलना मुश्किल ही नही नामुमकिन है.....
तो बताईये है क्या कोई ऐसा......?
डॉ गरिमा तिवारी, कोटा, राजस्थान
मिलेगा ऐसा कोई कभी?
कुछ दिनो पहले एक सहेली का रिश्ता आया था, उसे लोग देखने आये तो वो मुझे भी अपने साथ होने को बोली.... ऐसे माहौल पर मै हमेशा से जाने से कतराती हूँ, पर कोटा की एकमात्र हम उम्र महिला सहेली ने निवेदन किया तो टाला भी नही जा सकता था... उस दिन मै पुरे दिन उसके साथ रही... यहाँ तक की ब्युटीपार्लर तक जाना पड़ा साथ साथ (सबसे खतरनाक जगह), खैर मै उसका बनना सवरना देख रही थी, बीच बीच मे आँटी जी( उसकी मम्मी) नसीहते देना भी सुन रही थी, देख बेटी, सबके सामने आँखे झुका के बाते करना, जो कोई कुछ पुछे आराम से जवाब देना, तु कुछ मत पुछना.... वगैरह वगैरह... तभी अंकल जी ने कहा... और अपने लड़को जैसे दोस्तो को सामने मत लाना... और अपनी बहादूरी का बखान मत करना... सभ्य शालीन बनकर सामने आना... वगैरह वगैरह।अब ये सारी बाते उबकाई लाने के लिये बहुत लग रही थी... मै वहाँ से खिसकने के बहाने बना रही थी... लेकिन सहेली जी हैं कि बस... अंत तक उसे मेरी हालत पर तरस आ गया और मुझे निकलने की इजाजत दे दी एक शर्त के साथ की मै उसके दुसरे सहेली को साथ लेकर दुबारा 4 बजे आऊँगी... मुझे क्या चाहिये था.. खिसकने का बहाना... लेकिन ये क्या दुबारा आना... खैर मैने हाँ बोला और साँस लेने निकल पड़ी।
मै सोच रही थी कि कोई बहाना कर लूँ, पर वक्त पर उसकी सहेली आ गयी, और मरती क्या ना करती कबुतरखाने मे मुझे जाना ही पड़ा... वहाँ पहूँचे तो सब तैयार था... मेरी सहेली ने देखती ही इशारा किया (लेट क्यूँ किया?) वैसे जवाब वो जानती थी, मुझे कुछ कहना नही पड़ा... वैसे भी शायद मै बोल नही पाती..उन लोगो की बाते हो रही थी... बाते क्या सिर्फ सवाल... और सहेली कुछ सीमित शब्दो मे जवाब दिये जा रही थी। मै सोच रही थी मेरी शेरनी को क्या हुआ??? मेरी जिन्दगी मे यह पहला अनुभव इस तरह का.... वैसे टी वी सीरीयल मे कभी कभार देखा है या किसी से सुना है पर आँखो देखा अजीब लग रहा था...।भईया मेरी स्थिती को भाँप गये (सहेली के बड़े भाई), और मेरे लिये स्थिती सामान्य करने के लहजे से बोल पड़े, डॉ साहिबा जरा औरा रीडींग कर दिजिये... थोड़ा आपका मुड भी हल्का हो जायेगा, और हमे कुछ जानकारी भी मिल जायेगी.... हुह! तब से चुप बैठी थी... थैंक्स भईया बोल के एक एक की रीडींग शुरू.... लगभग सभी लोग संतुष्ट थे... तभी किसी ने पुछा.. क्यूँ बेटा तुम्हे शादी नही करनी? मैने सोचा अपना वही प्यारा सा जवाब दे दूँ "नही" ... पर मै बोली... करनी तो है.. परआँटी जी बोले कि मेरी नजर मे एक लड़का है कहो तो तुम्हारे मम्मी से बात करूँ?मैने कहा शौक से... पर मेरी कुछ शर्ते हैं, लड़का इन शर्तो पर खरा उतरता हो तो... और मेरे शर्तो कि श्रृँखला शुरू हुई---
1.लड़का बहुत लम्बा ना हो, ना ज्यादा छोटा हो... मतलब मेरे जैसा
2. मेरा हम उम्र हो
3. गुस्से वाला ना हो
4. उसे खाना बनाने आता हो
5. मेरा ऑफिस जान उसे नागवार ना हो
6. घर सम्भालने की जिम्मेदारी उसकी
7. मै कभी देर से घर वापस आऊँ तो कोई सवाल ना पुछे
8. मेरी प्राइवेसी मे ताका-झाँकी ना करे
9. मुझसे, कभी, क्यूँ इत्यादि सवाल ना करे
10. मै थकी रहूँ तो पैर भी दबाये
11. मतलब कि एक आदर्श गृहणी आजतक जो जो करती आयी है, लगभग सारे काम वो करेगा....
12. रोज रोज मेरे लिये बाजार से चॉकलेट लाये... हाँ मै चॉकलेट मे मामले मे इमानदार हूँ, वो मिल बाँट के खा लेंगे।
13. और इन सारे शर्तो मे मै अपने हिसाब से कभी भे घट बढ़ा सकती हूँ।
14. वो कभी कोई शर्त मेरे सामने ना रखे.............
अब ये सारे शर्त कोई लड़का पूरा कर सके तो जरूर बताना.... वरना जरूरत नही है। इतना कहना था कि सब ठहाके लगाकर हँस पड़े और एकमत स्वर मे बोले, ऐसा लड़का मिलना मुश्किल ही नही नामुमकिन है.....
तो बताईये है क्या कोई ऐसा......?
डॉ गरिमा तिवारी, कोटा, राजस्थान
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