Thursday, January 24, 2008

पालतु रखिये- तनाव मुक्त रहिये

पालतु रखिये- तनाव मुक्त रहिये

अवसाद मुक्त रहना हे तो कोई भी पशु पालिये। जी हाँ अचूक इलाज़ है अकेलेपन का भी और अवसाद का भी। मैंने अपने बचपन से इनका संग पाया है। बच्चों के हास्टल जाने के बाद तो इनका संग अपरिहार्य हो गया है। बडी बेटी जब आज से ४ साल पहले हास्टल गयी तो पास में इति थी छोटी बेटी। सूनापन मन के आंगन में पसरा पर उससे उबर गयी।

जब इति के हास्टल जाने की बारी आई तो अपने अकेलेपन के बारें में सोच-सोच कर कलेजा मुहं को आने लगता था। सबके सामने बहादुर बनी मैं अकेले में ना जाने कितनी बार अपने आंसू पौंछती थी। वो दिन भी आ गया जब खुद उसे छोडने गयी। चलते वक्त बरबस आंखें भर आयी। रास्ता पूरा मौन पर रोते हुये गुज़रा। मैं रो-धोकर जी हल्का कर लेती थी पर मनीष एक-चुप हज़ार चुप थे। घर जहां ५-६ लोग हमेशा होते थे अब हम दो। वाकई घर का सूनापन दिल के खालीपन को और बडा देता था।

मम्मी-पापा इति के जाने के पहले ही हैदराबाद जा चुके थे ।अपने छोटे बेटे के पास कुछ दिन रहने के लिये। मनीष हमेशा की तरह अपने काम पर जा चुके थे।मैं अकेली सुस्त बीमार सी चुपचाप पडी थी। सैमी( हमारी पालतु कुतिया) कई बार पास आकर उठाने की चेष्टा कर चुकी थी। तीन-चार दिन ऐसे ही निकले फिर सैमी ने खुब तंग करना शुरु किया। मेरे मुहं ढक कर लेटते ही कूं कूं करके रोना शुरु। मैं अपना दुख भूल कर जानने की कोशिश करती कि आखिर हुआ क्या है? थोडी-थोडी देर में ज़िद की बाहर घूमाने ले जाऔ। घूम कर आती तो एक-टक निहारती। जब मैं व्यस्त होती तो कोई बात नहीं ।पर खाली बैठते ही उसकी फर्माइश शुरु हो जाती।कुछ खाने को दो या खेलो। मनीष से वो थोडा डरती थी। पर इन तीन-चार दिनों में एक परिवर्तन मैंने महसूस किया । उनके आते ही दौड लगा कर जाती और पैरों में लौट लगाती । अपनी ऒर से उसका भरसक प्रयत्न होता की हम दोनों उससे खेलें या बातें करें। कुल मिला कर उसको हमारा चुपचाप उदास बैठना पसंद ना था।ये बात अब हम भी समझ रहे थे कि वो ये सब हमारे लिये कर रही है। पूरे समय हम दोनों की गतिविधियों पर नज़र रखती और ज़रा सा भी परेशान देखते ही गोदी में आ चढती। बातें वो सब समझती थी कोई गलती करती और शाम को मैं मनीष को बताती तो उसकी चापलूसी शुरू हो जाती कि मत बताऒ। संध्या को पूजा में दीपक जलाने जाती तो बीच पूजा में आकर गोदी में बैठना होता था। ये भी एक तरह की ज़िद थी। जब मम्मी घर में होती तो वो ना पूजा और ना रसोई में जाती थी। पर अब सिर चढे, चिपकू बच्चा बन कर मम्मी यानि मेरे पीछे घूमना होता था। पापा के साथ रात को खाना होता था चाहे मन ना हो रोटी निगलनी पड रही हो पर उसने अपना खाने का समय हमारे साथ का कर लिया था। शाम को मनीष कुछ हल्का-फुल्का खाते हैं। तो उस समय भी मनीष के हाथ से खाना है। कभी-कभी काजू खाने की फर्माइश होती थी। अब तो मनीष भी उसकी हर जरुरत ,पसन्द -नापसन्द को जान चुके हैं। सैमी को मनीष के साथ कार में घूमने जाना बहुत पसन्द था। खिडकी से मुंह निकाल कर ऐसे इतराती जैसे सबको बताना चाहती हो देखो ,मुझे देखो, अपने पापा के साथ घूमने आयी हूं। रेस्टोरेंट में आइसक्रीम खाना भी खूब पसन्द था। बडी तमीज़ से अलग कुर्सी पर बैठाया जाता । पेपर नेपकिन नीचे लगा कर चम्मच से आइसक्रीम खिलायी जाती । इतनी अदा से खाती की सब आस-पास वाले उसे निहारते और शायद ये बात वो जानती थी और उसे ऐसे मौकों पर मज़ा आता था। छोटे बच्चे उसे सख्त नापसन्द थे क्योंकि उनके आने से उसका गोदी में बैठ पाना मुमकिन नहीं होता था।बच्चे जब हास्टल से घर आते तो दो-चार दिन उसे अच्छा लगता ।फिर बच्चों से शुरु होती उसके अपने अधिकारों की लडाई। खासतौर पर मुझे लेकर । जब दोनों बेटियां गलबैंया डाल कर इधर-उधर लेटती तो वो बौखला जाती ।इति अक्सर उसको चिढाकर बोलती देख मेरी मम्मी और फिर दिखा-दिखाकर प्यार करती कुछ पल अपलक देखती और छलांग लगा कर मेरे ऊपर चढ बैठती फिर बडे गर्व से उन दोनों को देखती जैसे कह रही हो देख लो ये मेरी मम्मी हैं बस मेरी।


उसकी इन छोटी-छोटी हरकतों ने ,प्यार ने हमें अपने अकेलेपन और उदासी से निकलने में बडी मदद करी। सही मानिये इनका साथ आप में नई स्फूर्ति पैदा करगा। कई रिसर्च ने भी इस बात पर सहमती जताई है कि पालतु जानवर का साथ आपके तनाव को कम करता है और आत्मविश्वास को बढाता है। फिर देरी किस बात की आप भी आज़मा कर देखिये।

8 comments:

Gyandutt Pandey said...

निश्चित है - हमारा गोलू (गोलू पाण्डेय - हमारा प्यारा कुत्ता) अब नहीं है पर वह यादों में भी मन सहला जाता है।

Sanjeet Tripathi said...

ह्म्म, सहमत है पर हमने किसी पालतू को घर में रखा तो हमारी माताजी हमें ही घर से किक आऊट कर देंगी जी ;)

anitakumar said...

अरे वाह, बहुत खूब है आप की ये बिटिया, मनोविज्ञान में इसे कहते हैं ऐनिमल अस्सिटड थेरपी

Mired Mirage said...

संसार का कोई भी प्राणी पालतू जानवरों, जैसे कुत्ते या बिल्लियों की बराबरी नहीं कर सकता । कुत्ते तो मानसिग रोगी को भी ठीक करने में सहायता करते हैं ।
घुघूती बासूती

गरिमा said...

आपके विचारो से सहमत हूँ, और संजीत भाई के बात से भी :P

mamta said...

आपकी इस बात से हम पूरी तरह सहमत है।

जोशिम said...

हाँ .... ये तरीका "योगा" करने से अव्वल है ![:-)] - सादर - मनीष

PD said...

आपके कमेंट पढकर आपके ब्लौग पर घूमने आ गया.. अच्छा लगा.. सच पूछें तो मैं जैसी चीजें ब्लौग पर ढूंढता हूं उन चीजों से आपका ब्लौग भड़ा परा है.. यानी की यादों का पिटारा है आपका ब्लौग..
आपकी ये पोस्टिंग पढ कर बस एक ही बात मन में आया और वो है :)