Thursday, December 20, 2007

"उफ्फ ये मीडिया"

कुछ अच्छा सा देखने की नीयत से हम बार-बार टी.वी. का रिमोट खटकाये जा रहे थे। तभी नज़र पडी एक न्यूज़ चैनल से प्रसारित हो रहा था-थोडी ही देर में-"चोकिंग" युवाऒं खासतौर पर बच्चों में लोकप्रिय होता नया गेम। जिज्ञासावश हमने भी पूरा प्रोग्राम देखने की ठानी।

जैसे -जैसे चोकिंग गेम की असलियत सामने आयी हमारी रुह काँप गई। एक तरह से आत्महत्या की रिहर्सल जैसा कुछ-कुछ। इस बात पर और ज्यादा कोफ्त हुई कि जिस तरह से उस न्यूज़ चैनल ने पूरे दिन उस " गेम"को लेकर शगुफा फैलाया था उससे निश्चित ही दर्शक संख्या में इज़ाफा हुआ होगा। हमारे जैसे अज्ञानी भी पूरी तरह से इससे वाकिफ हो चुकें हैं । सोचिये "सिरफिरे" ,कुछ नया करने की चाह रखने वाले युवा खासतौर पर बच्चे । उनका क्या होगा? दावे से कह सकते हैं, कि जिस तरह से इस गेम की चर्चा करीं गई उससे प्रेरित हो कर कुछ लोग तो इसे ट्राई कर चुके होंगें।

चोकिंग-साँस रोकने की ऐसी प्रक्रिया जिससे ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और फिर मृत्यु की निकटता का अहसास किया जाता है। और उस अहसास को शब्द दिये गये"मृत्यु से एक मिनिट पहले मौत का रोमांच"।"ऑक्सीजन की कमी से जो अस्थायी परिवर्तन होते है उनका अहसास कई मादक पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होने वाले नशे से अधिक हैं।" इस तरह से इसके प्रभाव का वर्णन जैसे चोकिंग कोई बडी ही खास चीज़ है। इस तरह के उदाहरण मेरे ख्याल से काफी हैं ,उन लोगों के लिये जो किसी भी तरह का जोखिम उठाने का माद्दा रखते हैं है, या कुछ नया अनुभव करने की हसरत।

इस तरह के कायर्क्रम का औचित्य क्या है ? ये हमारी समझ के बाहर की बात है। आपको पता हो तो प्लीज़ हमें भी समझा दीजियेगा। वरना "मीडिया वालों को सदबुद्धि दें" कुछ इस तरह की प्रार्थना हमारे साथ कर लीजियेगा।

16 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

आपने टेलीवीजन पर प्रदूषण को सही रेखांकित किया अनुराधा जी। यही कारण है कि कुछ वर्षों से मैं टीवी देखता ही नहीं।

rajivtaneja said...

अपुन ने तो टीवी देखना ही छोडा हुआ है आजकल...
कुछ एकता कपूर सरीखे सीरियलों की वजह से..और कुछ बिना समाचार के चलते समाचार चैनलो की वजह से ऐसा विरक्ति भाव उत्पन हुआ है टीवी की तरफ ताकने का मन ही नहीं करता.....

नीरज गोस्वामी said...

अनुराधा जी
टीवी, जिसका उपयोग विकास में किया जाना चाहिए था विनाश में किया जाने लगा है. सारे धारावाहिक रिअलिटी शो और नाच गाने के कार्यक्रम समाज को कुछ अच्छा नही दे रहे बल्कि सच तो ये है की ये पूरे समाज के रूप को विकृत ही कर रहे हैं. अब अगर देखने वाले संवेदनशील नहीं रहे तो दिखाने वाले को शर्म कैसी? टीवी अब व्यापार का बहुत बड़ा माध्यम बन गया है और जो चीज़ बजारू हो जाए उससे किसी सुधार की अपेक्षा रखना मूर्खता है.
नीरज

Sanjeet Tripathi said...

शायद इसी "गेम" के चलते मुंबई के एक छात्र की जान गई दो एक दिन पहले ही। उस छात्र के माता पिता का बयान था कि उनका बेटा इंटरनेट के माध्यम से ऐसे किसी समूह के संपर्क में आया था जो इस "चोकिंग" नाम के गेम या खुशी के एहसास दिलाने के खेल को बढ़ावा देता है।

अगर मीडिया इस तरह के प्रयासों को बढ़ावा देता सा लग रहा है तो निश्चित ही यह गलत ही नही बल्कि अफसोसजनक है।

vijayshankar said...

aapki chinta ekdum jayaz hai.

बाल किशन said...

प्रार्थना छोड़ कर दूसरा कोई उपाय भी नही है.
वैसे सदबुद्धि तो इनको प्रार्थना से भी शायद ही आए.

महावीर said...

आजकल टी वी और फिल्में जहां क़त्ल,बलात्कार, जुर्म की दुनिया का क्रियात्मक खुलासा, शारीरिक अश्लीलता, खलनायक की भव्यता और ग्लैमर इन तस्वीरों में होते हुए भी युवा दर्शकों की आंखों की राह से गुज़र कर सीधे मस्तिष्क की चेतना को झंकारने लगते हैं। जो व्यक्ति एक चिड़िया के घायल होने पर द्रवित हो जाता था, इन फिल्मों को देख देख कर हत्या और बलात्कार का आदि हो जाता है।
1986 में ह्यूसमैन एंड ऐरन ने 22 वर्ष के अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि 8 वर्षीय बालक जो हिंसात्मक फिल्में देखते थे, 30 वर्ष की आयु तक किसी न किसी हिंसात्मक-अपराध में पकड़े गये थे। स्थिति कुछ सांप और छछूंदर जैसी है।टीवी ना तो फेंका जा सकता है और इसके बिना चारा भी नहीं।

महर्षि said...

अनुराधा जी मैं उसी कौम का हिस्‍सा हूं जिसके बारें में आपने लिखा है, लेकिन मैं चाह कर कुछ नहीं कर सकता

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

ek baat yad rakhie. kisi aisi bat ko prachar ki koi jarurat nahin hoti jo dekhe, samjhe ya jane jane layak hai. prachar ki jarurat unhi karyakramon ko jyada hoti hai jinme koi sarthak bat n ho - jaise nag-nagin ya bhut-preton wale karyakram, sas-bahu taip serial, filmi hero-hiroino ko lekar uthe vivad ... adi-adi. age se ap khud inke jhanse me ane se bache aur dusron ko bhi sahi ray dekar bachaen to hi apke is post ki sarthakta siddh hogi.

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

"इस तरह के कायर्क्रम का औचित्य क्या है ? ये हमारी समझ के बाहर की बात है। आपको पता हो तो प्लीज़ हमें भी समझा दीजियेगा।"

हम समझाये देते हैं. इन कार्यक्रमों का उद्धेश्य जनता की मदद या मनोरंजन नहीं बल्कि उनका अपना स्वार्थ है. इसके लिये वे जितने असामान्य कार्य कर सकते हैं उतना करेंगे.

जनता बेवकूफ होती है. वे इनके पीछे भागते है. आप जैसे कम हैं जो "औचित्य" के बारे में सोचते है -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

अजय यादव said...

सच कहा आपने, अनुराधा जी! बाज़ारवादी संस्कृति के आगे आज शायद जीवन-मूल्य पूरी तरह से गौड़ हो गये हैं, उसी का एक रूप यह भी है.

अजित वडनेरकर said...

अनुराधाजी, ये आपकी सदाशयता है कि आप सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करना चाहती है। एक मीडियाकर्मी होने के बावजूद मैं यही चाहता हूं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को ठोकरें खाकर संभलना होगा तो संभल जाएगा वर्ना इसे अपनी मौत मर जाना चाहिए।

Ravi yadav said...

आप और आपके परिवार को नव-वर्ष की ढेरों सारी शुभकामना,और बधाई.

Hindi Sagar

जोशिम said...

अनुराधा - आपको, परिवार, परिजनों को २००८ की बहुत शुभकामनाएं - आप ज्यादा लिखें और हम ज्यादा पढ़ें (आप को नहीं लगता दो पोस्टों के बीच अंतराल थोड़ा ज़्यादा है - इंतज़ार है) - मनीष

anitakumar said...

इसका औचित्य तलाश करने के बद्ले हमें ये सोचना है कि बच्चों को इस विनाश से कैसे बचाएं। अगर ये सोच कर बैठे कि मिडिया वालों की आत्मा जागेगी तो बेवकूफ़ी होगी

PD said...

mere paasa to TV hai nahi aur main khridane kaa socha bhi nahi rahaa hoon.. hama to bhai apane laptop par kit-pita kara hi khus hain..
vaise sahi baat to ye hai ki mere paas TV dekhane kaa samay bhi nahi hai..