Saturday, July 28, 2007

कविता

आधुनिक जीवन शैली की देन कि आदमी भीड में भी तन्हा है-

आदमी
मैं अवसादों से घिरा एक आम आदमी
दिक-भ्रमित,विश्रान्त आदमी
अनिश्चय की साकार मूर्ति
मैं एक क्लान्त आदमी
बाहें पसारें समा लेने को सारा जग
पर पाता मृग-मरीचिका शून्य
एक बार फिर मैं असहाय आदमी
उद्वेलित, आलोडित एकाकी आदमी

7 comments:

अजय यादव said...

आज के समय में हमारी बदलती जीवन पद्धति में एक आम आदमी की सोच और इच्छाओं को बहुत सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है आपने. बधाई स्वीकारें.

ग़रिमा said...

इंसान जो होता है वो होता नही, जो नही होता है वो होने की कामना करता है... यही से सारी परेशानियाँ होती है... सही चित्रण है.. बधाई।

अनूप शुक्ला said...

अच्छा है। लिखती रहें, अवसाद कम होंगे।

alok said...

wah its quite natural.i loved the message wat was hiden in the poetry.keep it up.try to write about the problems of children also.
Thanks
Alok nigam

Sanjeeva Tiwari said...

बढिया चित्रण किया है मानव के मनोभावों को, धन्‍यवाद ।

मैं नहीं हूं इस कविता में इसलिए जुड नहीं पा रहा हूं । कुछ मेरे लिए भी लिखें ।

(मैं एक विवेकहीन मनुष्‍य जो आपकी कवितायें पढ नहीं पाता)

संजीव का 'आरंभ'

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

यूनिकवि चुने जाने पर हार्दिक बधायी।

pushpa said...

aadhunik jeevan shailey har baat ka jawab hai aaj kal.aapki aadhunik jeevan shailey ki paribhasha kya hai?