Monday, August 17, 2009

कॉमनवेल्थ गेम और दिल्ली - एक नजरिया

कामॅनवेल्थ गेम्स के लिये तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। बहुत सारी प्लानिंग्स और दिल्ली के सौंदर्यकरण के लिये कुछ महत्वपूर्ण कदम भी उठाये जा रहें हैं। आज की टापॅटेन खबरों में था -कि दिल्ली की झुग्गी -झोपडियों को पर्दानशीं करने की योजना। कामॅनवेल्थ गेम्स के दौरान बाहर से आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को उनके दीदार न हो इसके लिये झुग्गी -झोपडियों को बांस की खप्पचियों की चार-दीवारी से ढक दिया जायेगा ताकि उनके अस्तित्व को लेकर ,उनके जीवन-स्तर को लेकर अनावश्यक शर्मिन्दगी से बचा जा सके।

क्या इस कदम का कोई औचित्य है? झुग्गी वासियों के लिये कुछ नहीं किया गया ।झुग्गी -झोपडियों के उन्मूलन के लिये कोई कदम नहीं उठाया गया बल्कि बांस की चारदीवारी से उन्हें छुपाने का अनथक प्रयास जरूर शुरू होने वाला है। इनके अस्तित्व को लेकर यदि इतनी ही परेशानी है तो झुग्गी -झोपडियों के अस्तित्व को मिटाने के लिये ,उनके उन्मूलन के लिये कोई मुहिम शुरू क्यों नहीं करी जाती ।कोई ठोस योजना को क्रियान्वित क्यों नहीं किया जाता। जब भी कोई झुग्गी कुकरमुत्ते की तरह पनपने लगती है तो उसी समय उनके रहवासियों के रहने की व्यवस्था व उनकी समस्याओं का निराकरण क्यो नहीं किया जाता।सरकार क्यों निर्धारित किराये पर इन्हें बहुमंजिला आवास उपलब्ध नहीं करा सकती?

झुग्गी-झोपडियों में रहने वालों की अहमियत को दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि आम लोगों की रोज-मर्रा की जिन्दगी को सुचारू रूप से चलाने में इनका बहुत बडा योगदान है। कामवाली बाई,मजदूर,कारीगर भंगार वाले और भी बहुत से लोग वहीं से हैं । हम हर समस्या का निराकरण करने में सक्षम हैं पर समस्या व समाधान का राजनीतिकरण, अफसरशाही,बाबूशाही व भ्रष्टाचार किसी भी योजना को पनपने ,साकार होने व सफल होने से पहले ही दम तोडने को मजबूर कर देती है।इच्छा शक्ति की अल्पता व सहयोग की कमी भी योजना को मूर्तरूप नहीं लेने देती। इंडोनेशिया से हमें सबक लेना चाहिये-जहां झुग्गी-झोपडियों के उन्मूलन के लिये एक व्यक्ति के द्वारा शुरू किया गया प्रयास एक अभियान बन चुका है। एंडी सिसवांतों के अनथक प्रयत्न व प्रयासों को चौतरफा सहयोग मिला तो झुग्गीवासी विस्थापित होने की बजाय अपनी जमीन के मालिक बनें व उनके जीवन-स्तर में व्यापक बदलाव आया। आज इंडोनेशिया के कई शहरों में ये प्रोजेक्ट जोर-शोर से चल रहें हैं तथा सफलता प्राप्त कर रहें हैं।आज हमें भी कुछ ऐसे ही एंडीसिसवांतों की जरूरत है जो हमारे अपने लोगों के जीवन-स्तर व जीवन-यापन के तौर-तरीकों में अहम बदलाव ला सके । जरूरत है कि इन्हें मुख्यधारा में होने का अहसास कराया जा सके । भविष्य मैं हमें इन्हें छुपाने या इनको लेकर हीन -भावना से ग्रस्त होने की बजाय हमें इनके विकास के लिये ठोस कदम उठाना ही होगा।

17 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

वाह आपने वहां बैठे बैठे दिल्ली और इन्डोनेशिया के हालात जान लिये..

बहुत गहरी साजिशें हैं... झुग्गी झोंपडी के लोंगों को बसाने के लिये कई बार यहां पर फ़्लेट आवंटित किये गये मगर आज भी उतनी ही झुगियां हैं.. क्योंकि एक माफ़िया काम कर रहा है.. झुगियां भी उन्हीं के अधिकार में हैं और फ़्लेट भी उन्ही के हिस्से में आते हैं.. असली हकदार तो कुछ रुपये लेकर फ़िर से एक नई झुग्गी बना लेते हैं.. साथ ही राजनेताओं को भी यह वोट बेंक नजर आता है.. सो वह खुश हैं इन्ही हालात में.

अनिल कान्त : said...

मैं आपके लेख से पूर्णतः सहमत हूँ

aarya said...

अनुराधा जी!
सादर वन्दे,
ये वही लोग हैं जिन्होंने स्लम डाग मिलियेनियर को आस्कर मिलने पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सभी जननायको (हमारे राज नेता ) ने गर्व करते हुए देश को लम्बा भाषण पिला दिया था, उन्हें तब शर्म नहीं आई तो अब क्या आएगी, जिसे ये आज दुनिया से छुपाने कि कवायद कर रहे है उसे पुरी दुनिया ने देखकर ही आस्कर अवार्ड दिया था, आपका लेख व सुझाव स्वागत योग्य है.
रत्नेश त्रिपाठी

Dr. Mahesh Sinha said...

योजना तो है राजीव गाँधी शहरी मिशन लेकिन हाल वही जो ज्यादातर योजनाओं का होता है . मनमोहन जी मुंबई को शंघाई बना रहे थे कहाँ तक पहुंचे ?

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

विचारणीय लेख,
आभार

Kusum Thakur said...

लेख के जरिये आपने जो विचार रखे हैं वह सही में विचारनीय है.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

vakai..lekh bahut achha he/
ab sochne vaalo ke upar he ki vo kitne is vichaar ko grahn karte he/ khaas baat to yah ki vikaas ke naam par hame bahut kuchh khona bhi padta he/ kintu is khone me hamara vazood jab aahat hota he to yakinan dard hota he/

हेमन्त कुमार said...

अनुराधा जी,
आज की यही नीयति हो गयी है - सच का सामना करने के बजाय विकल्प तलाशना।
सादर आभार। जय हिन्द !

Arvind Mishra said...

सहमत -झुगी झोपडियों के लोगों के पुनर्वास /पुनर्स्थापन के लिए सोची समझी नीति जरूरी है !

शरद कोकास said...

रमेश उपाध्याय जी का एक उपन्यास है दण्डद्वीप जिसका एक वाक्य है " यह झुग्गियाँ हम शहरवासियों का ही पाप है"

दिगम्बर नासवा said...

aapka lekh vichaarniy hai ..... par is samasya ka ilaj itna aasan nahi hai .... jhuggi - Jhonpde vale aaj kar kisi n kisi raajnetaaon ki aad mein kisi GROUP ki tarah kaam karte hain .........

अर्शिया said...

आपकी सलाह जायज है।
( Treasurer-S. T. )

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इन गेम के सहारे शहरों का भी काफी कायाकल्प हो ही जाता है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

psingh said...

bilkul thik kaha apne
abhar

दिगम्बर नासवा said...

आपकी बात में दम है ...

सुशील कुमार छौक्कर said...

शर्म आती है ऐसी योजना बनाने वालो पर। आप जैसे है उसे दिखाने में कैसी शर्म, ये तो हमारे बडे बुर्जुग भी कह गए। सच तो ये भी कोई भी अपना कर्तव्य नही निभा रहा है। चाहे वो झुग्गी वाले हो और या योजना बनाने वाले या फिर नेता।

अविनाश वाचस्पति said...

वाकई चिंतनीय है यह सब। चिंतनीय भी और निंदनीय भी। पर न कोई निंदा करता है और न करता है चिंता। सत्‍तापक्ष तो इस पर सेज सजाता है।