Friday, September 28, 2007

क्या था सच

वो क्या था। सच या कुछ और, आज भी सोचती हूँ तो निष्कर्ष नहीं निकाल पाती। वो दिन आज भी अच्छी तरह से याद है। 1980 की सर्दियों के दिन थे और मैं उस दिन कालेज नहीं गई थी। भैया भी समय से पहले घर आ गया था साथ में बल्लू,महेन्द्र और प्रवीण भी थे।

थोडी देर इधर-उधर की बात करने के बाद भैया एकाएक बोला "तू और कुसुम पिक्चर देख आ "। पिक्चर की बात सुनकर एक बार तो मैं खुश हुई लेकिन अगले ही पल शक का कीडा कुलबुलाया आज इतनी मेहरबानी क्यों? भैया फिर से बोला सोच ले जाना है तो बल्लू टिकिट लेकर बैठा आयेगा । नहीं मेरा मन नहीं है पता हैना आज कालेज भी नहीं गई । मेरा क्या बैठी रह फिर मत कहना ध्यान नहीं रखता।ठीक है नहीं कहूंगी ।हम दोनों अब झगडने के मूड में आ चुके थे तब तक महेन्द्र बोला "अच्छा
साधना के घर जायेगी मैं छोड देता हूँ जब बोलेगी लेने आ जाऊँगा ।अब तो शक यकीन में बदलने लगा कि चारों कुछ खिचडी पका रहें हैं तभी घर से बाहर भेजने पर आमादा हैं। अब मैं भी कमर कस चुकीं थी कि चाहे कितने प्रलोभन दे कहीं जाना नहीं हैं। अब भैया ने पैंतरा बदला बोला "हमें क्या हम तो साथ बैठ कर पढेंगें तू होती रह बोर "। मैं क्यों बोर होऊँगीं मैं भी तुम्हारे साथ पढूँगीं इसी बहाने मेरी भी पढाई हो जायेगी मैं बोली । अब तो चारों चिन्तित नजर आने लगे । सीधे-सीधे बताऔ क्या बात है । क्या-क्या बात है ? हर समय जासूसी करने पर आमादा रहती है भैया चिल्लाया। जा अन्दर हमको पढने दे बीच में आकर तंग मत करना । नहीं मैं नहीं जाऊँगी। तुम सबके साथ बैठुँगी चाहे कुछ हो। बात बढती देख अब प्रवीण बीच में बोला "तू जाना हमको पढना है।"

भैया और मेरा झगडा कोई नया नहीं था उन लोगों के लिये पर आज चारों कुछ ज्यादा ही विचलित हो रहें थे । अव्छा मुझे भी बताऔ बात क्या है वरना मम्मी को बता दूँगी कि कालेज मिस किया था तुम सबने।
ठीक है बता देंगे लेकिन किसी से कहा तो ठीक नहीं होगा। प्रामिस किसी से नहीं कहूँगी कुछ भी । आज हम आत्मा बुलायेंगें तू डरेगी और सारा काम बिगाड देगी भैया बोला। नहीं बिल्कुल नहीं डरुगीं किसी को नही बताऊँगी। आखिर में ये तय हुआ कि उनकी प्लेनिग में मुझे भी शरीक किया जायेगा । शर्त ये है कि उनका दिया हुआ काम बिना तर्क -वितर्क किये हुए करना है साथ ही किसी को नहीं बताना है कि क्या किया गया था ।

पहला ऑर्डर मिला कि कमरे में पौंछा लगाया जाये ,चुपचाप वो कर दिया फिर आदेश मिला कि दिया और अगरबत्ती जलाऔ। तब तक उन चारों ने एक चार्ट जैसा बनाया था उसे टेबिल के मध्य बिछा दिया साइड में दिया और अगरबत्ती जला दी गई।
बल्लू को कागज-पेन लेकर बिठाया गया ताकि वो सब कुछ लिख सकें। कगज के मध्य एक छोटी कटोरी थी जिस पर बाकि सबने अपनी एक-एक अंगूली रखी और आव्हान शुरु किया पवित्र आत्मा आप आइये आप आइये, यदि आप आ चुकीं हैं तो यस पर जाइये कटोरी धीरे-धीरे यस पर आ गई ।मुझे लगा ये इन सबकि शरारत है । कटोरी ये सरका रहें है । पहला प्रश्न महेन्द्र ने किया " मामा जी का मर्डर किसने ,कब ,कहाँ किया और क्या सजा होगी "। कटोरी पूर्ववत अक्षरों पर घूमती रही जिन्हें बल्लू लिखता गया । अगला प्रश्न प्रवीण ने किया "अंजू की शादी कब होगी? " तीसरा प्रश्न भैया ने किया मम्मी के स्कूल की एक टीचर ने आत्महत्या करीं थी दो दिन पूर्व तो वो किस तरह से मरीं थी जवाब मिला जल कर जबकि इस बात को सिर्फ दो जने जानते थे मैं और भाई। तो फिर इसका मतलब क्या था ?

बल्लू ने कोई भी प्रश्न पूछने से मना कर दिया साथ ही मेंने भी ।
अब फिर एक बार सम्वेत स्वर में प्रार्थना करीं कि पवित्र आत्मा आप लौट जाइये कटोरी बार-बार नो पर जा रही थी ।शुरु मैं मैंने ध्यान नहीं दिया पर जैसे ही उन चारों कि शक्ल पर नजर पडी तो पाया कि चारों पसीने-पसीने हो रहें थे और साथ ही स्वर में व्यग्रता बढती जा रही थी । काफी देर बाद कटोरी का मूवमेंट बन्द हुआ । हमेशा चहकने वाला भैया खामोश था । बहादुर बनने वाला महेन्द्र शान्त, प्रवीण डरा हुआ था ।

अब मैं भुनभुनाई, तुमको कोई और तरीका नहीं मिला था क्या डराने के लिये । तब भैया बोला पागल है - ये सब तो सच में हुआ । तुम चारों कि प्लानिंग थी मुझे डराने की ,मैं लगातार गुस्सा हुए जा रही थी । तुम लोग ही डरें मुझे तो कुछ नहीं हुआ अपने मनोभावों पर काबू करते हुए बोली।


अब बल्लू भैया से कागज लेकर हमने पढना शुरु किया ।महेन्द्र के मामा जी का मर्डर हुआ थ ये बात हममें से कोई नहीं जानता था । जो नाम बताये गये थे उन नाम के शख्स पर केस चल रहा था और ये बात सच थी महेन्द्र ने बताया । अंजू की शादी भविष्य की बात थी वक्त आने पर ही पता चलेगा । टीचर की मृत्यु का तरीका भी सही बताया गया था ।
जो कुछ अनुभव हुआ ये हकीकत थी या कोई चाल मैं अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहीं थी ।सब एक -दुसरे से पुछ रहे थे कि "तूने पुश किया था "। जब सबने एक ही उत्तर दिया नहीं तो एक सिहरन सी दौड गई ।


कुछ महीनों के बाद महेन्द्र ने बताया कि फैसला हो गया और फैसला वो ही था जो उस दिन बताया गया था। अंजू की शादी भी पूर्व बतायी तारीख में ही तय हुई ।
अब मिला-जुली प्रतिक्रिया थी काश कुछ ऒर भी पूछा होता ।
दूसरी कि कितने गलत थे हम सब ।
हर बात को मजाक में लेना और प्रकृति के नियम में दखलन्दाजी करना वाकई गलत था ।
बात घर वालों पर खुल चुकीं थी बहुत डाँट पडी हम सबको। भविष्य के लिये समझाया गया ।

5 comments:

शैलेश भारतवासी said...

बचपन में सभी इस तरह की शरारत करते हैं। अच्छा लगा पढ़कर

Sanjeet Tripathi said...

प्लेनचिट के माध्यम से आत्माओं का आह्वाहन करने के की प्रसंग व संस्मरण पढ़े ज़रुर हैं पर व्यक्तिगत रुप से ऐसा कोई अनुभव हमें नही है!!

हां जैसा कि आपने लिखा है कि वह आत्मा जाने से इंकार रही थी ऐसे मे किसी अनहोनी से इंकार नही किया जा सकता था अगर वह सच मे ही आत्मा रही हो तो!

अजित said...

sharaaraten aur samajhaaish dono zaroorii hain.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

Accha laga aapake Blog ko dekhanaa.

Udan Tashtari said...

क्या बात है कि इस पोस्ट के बाद कुछ लिखा नहीं जा रहा है??

सब ठीक ठाक तो है?